एक बार जीने के लिए सौ बार मरे है हम

एक बार जीने के लिए सौ बार मरे है हम
एक मुसकुराहट के लिए कितना सिसका यह गम
यह जीवन जलता जलता भी नहीं
कितना जलया इसने हर दम
एक लमहा जो छुप गया आसमान तले
ढूँढते फिर रहे हैं बस उमर भर से हम
मेरी खामोशियाँ बन गई मेरे  गुनाह
हर पल नया गुनाह करता रहा यह मन
उम्मीद की यह लौ क्यों नहीं बुझती
थम गयी जब यह सासों की सरगम
किस तरफ़ जा रहा हूँ ,क्यों जा रहा हूँ
कोइ बता दे मुझे कहाँ ले जायेंगे यह कदम
अपनी मजबूरिओं से नराज़ है यह दिल
मजबूरियों के लिए उठाये गए ज़िंदगी तेरे सितम
आँसू में भीगा यह मन यह आँचल
इक हँसी की चाह मैं अब तक आंखें हैं यह नम !!!!!!!!!!!!

2 Responses to “एक बार जीने के लिए सौ बार मरे है हम”

  1. JAI Says:

    VERY NICE.

  2. Rakesh Says:

    thanks

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