चूहा भी कभी शेर था

एक शादी की पार्टी में अच्छी रौनक थी। अधिकांश दूल्हे के दोस्त उसे छेड़ रहे थे। एक उत्साही ने तो पूरी कहानी ही सुना दी- ‘एक चूहा, शेर की मैरिज का कार्ड बांटते हुए हर एक को कहता कि मेरे छोटे भाई के विवाह में आप जरूर आना। एक ने हैरान होकर पूछ ही लिया, तू चूहा वो शेर, ये कैसे हो सकता है? चूहे का जवाब था, शादी से पहले तो मैं भी शेर था।’ चुटकुला अत्यंत पुराना और तकरीबन सभी पाठकों ने सुन रखा होगा। सुनकर हंसी आना भी स्वाभाविक है। परंतु इस तीखे व्यंग्य के भावार्थ में छुपी पीड़ा को या तो हम समझते नहीं या जानकर भी अनजान बने रहना चाहते हैं। वैसे भी पुरुष झूठे अहम्‌ में ही मरता रहता है और घर में मार खाने पर भी बाहर कम ही बताता है। विगत सप्ताह एक प्रतिष्ठित समाचारपत्र में एक लेख छपा था, जिसके अनुसार चीन में विवाह की संख्या पिछले कुछ वर्षों में अचानक तेजी से गिरी है। ऐसा बताया जा रहा है कि इसके पीछे प्रमुख कारण है औरत के पक्ष एवं आदमी के विरुद्ध कानून का एकतरफा सख्त होना। पुरुष की कहीं कोई सुनवाई नहीं है और फलस्वरूप उसकी स्थिति कई जगह दयनीय होती जा रही है। कारण और भी हैं आधुनिक नारी का अधिक स्वकेंद्रित, अपने अधिकारों के प्रति अत्यधिक सचेत, अति महत्वाकांक्षी होते हुए पति पर अतिरिक्त नियंत्रण करना और अपनी इच्छाओं व पसंद-नापसंद को परिवार के अन्य सदस्यों पर जबरदस्ती थोपना। और उसके न माने जाने पर पहले बातचीत फिर वाक्‌युद्ध और फिर आंसू के बाद कानून और पुलिस तक का दुरुपयोग करना। अड़ोस-पड़ोस और समाज की सहानुभूति मिलती है वो अलग, कहीं-कहीं तो उनका व्यवहार हिंसक भी होने लगा है।

चीनी नवयुवक, शादीशुदा पुरुषों का बुरा हाल देख-देखकर इस नरक से बचना चाहता है। पश्चिम में तो नर-नारी के अहम्‌ के टकराव के कारण परिवार व समाज का रूपांतरण तेजी से हो ही रहा है। भारत में भी हालात ठीक नहीं है। पहले जहां स्त्रियों की स्थिति दयनीय थी वहीं आज आधुनिक युग में परिवार की हालत बिखर रही है। औरतों के लिए कानूनी संरक्षण बढ़ने के बावजूद स्थिति को संपूर्णता में देखें तो कई पहलुओं से लाभ नहीं हो रहा, उलटे तलाक की संख्या और परिवार में हिंसा बढ़ रही है। औरतों का शोषण अब अप्रत्यक्ष रूप से होने लगा है तो बच्चों को मानसिक तनाव में जीना पड़ रहा है। अतः आवश्यकता है एक निष्पक्ष राय कायम करने की।

यह लेख लिखने पर हो सकता है कि मुझे नारी विरोधी करार दिया जाए। कोई नारीवादी संगठन मेरे खिलाफ मोर्चा भी खोल सकता है। घर में पत्नी के तानों की संख्या में इजाफे से भी इंकार नहीं करता। बेटियां मुझे पुराने खयालात का भी घोषित कर सकती हैं। महिला पाठकों की भावना को ठेस भी पहुंच सकती है। कोई मुझे दंभी, निरंकुश, पुरुष प्रभुत्व की सोच वाला भी बोल सकता है। परंतु असल में यह सत्य नहीं है, चूंकि जो कुछ घटित हो रहा है वो सहज सामान्य नहीं। भविष्य में उपजने वाली जटिलताओं से मुंह चुराना उचित नहीं। यह पुरुष और महिला दोनों के हित में होगा जो वो समाज की दिशा व दशा पर समग्रता से विश्लेषण करेंगे। ठीक है कि समाज युगों से पुरुष प्रधान रहा है मगर हम यह क्यूं भूल जाते हैं कि परिवार सदा ही नारी केंद्रित रहा है। इसमें भी कोई शक नहीं कि पुरुष ने नारी पर सदियों से अत्याचार किए और उसका शारीरिक और मानसिक रूप से शोषण भी हुआ। पर्दा प्रथा, सती प्रथा, विधवा का नारकीय जीवन देख उसके अबला सिद्ध होने में कोई कसर नहीं। बाल-विवाह के द्वारा मासूम बच्चियों को मसला गया तो औरत, बलशाली की हवस का शिकार होती रही। बलात्कार भी उसके साथ ही होते रहे हैं। वेश्या, कुलटा, बांझ जैसे शब्द नारी के संदर्भ में ही बने हैं। इतने दुःखों के बावजूद इतिहास, नारी के त्याग, समर्पण और निश्छल प्रेम के अनगिनत उदाहरणों से भरा पड़ा है।

मगर विगत कुछ वर्षों से एक दूसरी कहानी भी सुनने में आने लगी है और जिसके प्रभाव में तेजी है। औरतों द्वारा बलात्कार और दहेज विरोधी कानून का सहारा लेकर झूठे केस दर्ज किए जा रहे हैं। सीधे-सादे सास-ससुर को फंसाया जा रहा है। कई शरीफ परिवार तो इसी डर से बहू का आतंक सहने लगे हैं। अधिकांश बुजुर्गों को बेघर करने के पीछे घर की औरत अधिक जवाबदार दिखाई देती है। आशिक से मिलकर पति की हत्या, अनैतिक संबंधों की संख्या में बढ़ोतरी हुई है। पत्नी पीड़ित संगठन दिखाई देने लगे हैं। प्रेम का नाटक कर औरतें ब्लैकमेलिंग तक करने लगी हैं। अब कार्यालयों में महिला कर्मी को टोकना खतरे से खाली नहीं और कई उच्च और चरित्रवान अफसर इसके चपेट में आकर अपना सब कुछ खो चुके हैं। रिश्वत लेते महिला अधिकारी का दिखाई देना अब आश्चर्य पैदा नहीं करता। परिवार के बढ़ते कलह से युवकों में आत्महत्या की प्रवृत्ति बढ़ रही है तो घर के तनावपूर्ण माहौल से मनोरोगी की संख्या तीव्र गति से बढ़ी है। लड़के की शादी के पूर्व उसके मां-बाप आशंकित रहते हैं और कई बार तो भयभीत होकर विवाह को टालते रहते हैं। औरतों की जुबान तेजी से चलती है और घरों में लड़ाइयां रोज देखी जा सकती हैं। पति को खिलाकर भोजन करने वाले युग की समाप्ति-सी प्रतीत होती है और आदमी चाहे फटा हुआ कोट पहने औरतें सजी-धजी ही मिलेंगी। मायके के लिए हलुआ और ससुराल को पानी भी न पिलाने के लिए तैयार नारी यह भूल जाती है कि उसकी भाभी भी उसके साथ ऐसा ही बरताव करे तो उसे कैसा लगेगा। मां द्वारा बेटियों को ससुराल के बारे में अपने झूठे-सच्चे अनुभवों को बांट-बांट कर दूषित कर दिया जाता है और इस तरह से पूर्वाग्रह से ग्रसित भविष्य की नारी का जन्म होता है।

आदमियों के बीच में यह मुहावरा तो कई पीढ़ियों से सुनाई देता था, शादी के लड्डू जो न खाए वो पछताए जो खाए वो भी पछताए। परंतु इसके पीछे छिपे आंतरिक दबाव को समझना आज अधिक प्रासंगिक होता जा रहा है। इसका मतलब यह कदापि नहीं कि नारी ने उन्नति नहीं की। उसने हर क्षेत्र में अपना नाम सुनहरे अक्षरों से अंकित किया है और अपनी प्रतिभा की पहचान बनाई है। विज्ञान, तकनीकी, खेल, राजनीति, साहित्य, पुलिस, सेना, अंतरिक्ष तक में उसने अपनी उपस्थिति दर्ज की है। मगर ऐसा नहीं कि इस काल में नारी की परेशानियों में कमी आई है। बलात्कार और हिंसा में उलटे वृद्धि हुई है और साथ में तलाक, अविवाहित जीवन के फलस्वरूप अकेलापन, चिड़चिड़ापन व मानसिक दबाव बढ़े हैं। घर-बाहर की दोहरी जवाबदारी और बच्चों के प्रति ममत्व के कारण वो पिसती-सी नजर आ रही है और कहा जा सकता कि उसने अपने लिए सुख कम तो दुःख अधिक इकट्ठे किए हैं। विकास और स्वतंत्रता की कीमत अधिक चुका रही है और अपनी सुरक्षा के नाम पर पुरुष पर अतिरिक्त प्रभुत्व उसे फायदे से अधिक नुकसान पहुंचा रहा है। असल में औरत की दुश्मन औरत अधिक है। वे घरों में, पड़ोस में, कार्य क्षेत्र में एक-दूसरे को तंग करते हुए अधिक मिलेंगी। अधिकांश पति सामान्य होते हैं और बेवजह यूं ही पिसते हैं, और जो तेज हैं उन्हें कभी कोई परेशानी नहीं होती, उलटे बदमाश आदमी की अय्‌याशी में भी दूसरी औरत ही होती है। आज सफलता पाने के लिए कुछ औरतें अपने ग्लैमर का उपयोग भी करती है और फिर उससे बचना भी चाहती है। पढ़ी-लिखी औरतें हक अधिक और कर्तव्य भूल रही हैं। वो ज्ञानी तो हो गई मगर समझदारी और व्यावहारिकता की उसमें कमी आ चुकी है। सौंदर्य का स्थान ग्लैमर और त्याग का स्थान अधिकार ने ले लिया है। आदमी के कंधे से कंधा मिलाकर चलने के चक्कर में पुरुष के अवगुण तो सब ले लिए मगर स्वयं के अच्छे गुण जाने-अनजाने छूटते जा रहे हैं।

इसका मतलब यह कदापि नहीं कि आदमी कोई दूध का धुला और शरीफ सच्चा है। उस पर ज्यादा यकीन भी नहीं किया जा सकता। लेकिन उसे नियंत्रित करने के चक्कर में हम कहीं दूसरी बड़ी गलती तो नहीं कर रहे? नारी की अतिरिक्त शासकीय और संवैधानिक सुरक्षा उसके लिए परेशानी का कारण न बन जाए। यह कानून बनाने वालों, समाजशास्त्री, लेखक, चिंतक, गुरुओं और राजनेताओं को सोचना होगा। खुद नारी को सोचना होगा कि कहीं वह आर्थिक रूप से स्वतंत्र होते ही बंधनमुक्त होकर गलत दिशा की ओर तो नहीं बढ़ रही। अनियंत्रित स्वतंत्रता उच्छृंखलता में परिवर्तित हो जाती है जो फिर कटी पतंग की तरह किसी काम की नहीं। समाज की व्यवस्था बड़ी जटिल है। इसमें सामंजस्य और समर्पण जरूरी है। थोड़ा-सा भी संतुलन बिगड़ने पर परेशानी बढ़ सकती है। बड़े व संयुक्त कुटुम्ब से एकल परिवार बनने लगे, यहां तक तो ठीक था, मगर अब आदमी औरत अकेले ही रहना चाहते हैं और अगर आधुनिक विकासक्रम को यही पसंद है तो फिर कौन रोक सकता है। लेकिन फिर हमें इसके होने वाले नुकसान के लिए तैयार रहना होगा। और फिर इसके बाद भी खुशी न मिले, सुख का एहसास न हो तो सब कुछ निरर्थक है।

2 Responses to “चूहा भी कभी शेर था”

  1. gourav Says:

    wah ji wah aap to kamal ki चूहा aur कभी शेर ki kahani likhati hai


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